Saturday, July 17, 2010

मैं और मेरा गाँव ....

आँख ने देखे न जाने ख्वाब कितने स्वर्ग के
किन्तु भूला मैं नहीं हूँ ख्वाब में भी पाँव को
आबो हवा में शहर की मैं रह रहा बरसो बरस
किन्तु भूला मैं नहीं हूँ ख्वाब में भी गाँव को ।
[] लक्ष्मी कान्त

2 comments:

  1. ब्लॉगिंग की दुनिया में स्वागत है . गाँव की सौंधी सुगंध लिए अभिव्यक्ति की निरंतरता के लिए शुभकामनाएं .
    [] राकेश 'सोहम'

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  2. बहुत ही सुन्दर।

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